झारखंड राय विश्वविद्यालय, रांची में 20 से 22 नवंबर 2025 तक चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व का समग्र विकास विषय पर विद्यार्थी प्रतिनिधि केंद्रित तीन दिवसीय कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा के माध्यम से विद्यार्थियों और शिक्षकों के समग्र व्यक्तित्व विकास को समझना और उसे जीवन में व्यावहारिक रूप से लागू करना था। इस दौरान पंचकोश अवधारणा (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश ) पर आधारित शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास विकास पर जोर रहा।
उद्घाटन सत्र :
उद्घाटन सत्र में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी, प्रो. (डॉ.) गौतम सूत्रधार, निदेशक, एनआईटी जमशेदपुर कुलाधिपति प्रो. (डॉ.) सविता सेंगर झारखंड राय विश्वविद्यालय, रांची और कुलपति प्रो. (डॉ.) पीयूष रंजन की गरिमामयी उपस्थिति रही। सत्र के मुख्य वक्ता डॉ. कोठारी ने कार्यक्रम की शुरुआत ॐ तथा “तमसो मा ज्योतिर्गमय” मंत्र के सामूहिक उच्चारण से करवाई और विद्यार्थियों से अनुभव साझा करने को कहा। उन्होंने बताया कि यदि किसी कक्षा की शुरुआत ॐ से हो, तो वातावरण शांत रहता है, मन स्थिर होता है और एकाग्रता स्वाभाविक रूप से बढ़ती है। उन्होंने विद्यार्थियों से यह भी पूछा कि कौन–कौन सुबह अपने इष्ट देवता का स्मरण करके आता है, और सुझाव दिया कि उसी समय ॐ का उच्चारण मानसिक संतुलन के लिए अत्यंत लाभकारी है।
चरित्र निर्माण पर बोलते हुए उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचार “Good habit is value” का उल्लेख किया और कहा कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे बड़ों को करते हुए देखते हैं। एक चोर की कहानी के माध्यम से उन्होंने समझाया कि छोटी गलतियों पर समय रहते रोक लगाने से बड़े अपराध टल सकते हैं, इसलिए प्रारंभिक जीवन में सही दिशा देना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि घरेलू कार्य—जैसे झाड़ू–पोंछा या अपने कार्य स्वयं करना—व्यायाम का ही रूप हैं और आत्मनिर्भरता बढ़ाते हैं। जापान का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहाँ लोग अपना काम स्वयं करते हैं और यही आदतें राष्ट्रीय चरित्र का आधार बनती हैं।
पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता की जिम्मेदारी और प्राणायाम के महत्व को उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया।
डॉ. कोठारी ने छात्र-प्रतिनिधियों से अपेक्षा की कि वे कार्यशाला से प्राप्त सीख को अपने साथियों तक पहुँचाएँ और भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों को व्यवहार में उतारने में अग्रणी भूमिका निभाएँ। सत्र के अंत में विश्वविद्यालय की अर्धवार्षिक पत्रिका ‘संवित्’ का लोकार्पण किया गया।
पत्रिका लोकार्पण के उपरांत विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति में लोह-निर्माण भट्टी का उद्घाटन किया गया। इस अवसर पर डॉ. अतुल कोठारी ने भट्टी की निर्माण प्रक्रिया, इसके पारंपरिक और वैज्ञानिक पक्षों तथा भारतीय धातु-विज्ञान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझा। एनआईटी जमशेदपुर के प्रो. (डॉ.) गौतम सूत्रधार, झारखंड राय विश्वविद्यालय की कुलाधिपति प्रो. (डॉ.) सविता सेंगर तथा कुलपति प्रो. (डॉ.) पीयूष रंजन भी इस महत्वपूर्ण क्षण में उपस्थित रहे। अतिथियों ने इसे अनुभव–आधारित शिक्षण का सशक्त उदाहरण बताते हुए कहा कि ऐसे प्रयास विद्यार्थियों में अनुसंधान, स्वदेशी तकनीकों की समझ और नवाचार के प्रति रुचि विकसित करते हैं।
पंचकोश आधारित सत्र :
कार्यशाला के पहले दिन अन्नमय एवं प्राणमय कोश से जुड़े सत्र में भोजन और स्वास्थ्य के वैज्ञानिक संबंध, श्वास–प्रश्वास तथा ऊर्जा–संतुलन, और भावनात्मक स्थिरता जैसे विषयों पर चर्चा की गई। अन्नमय कोश सत्र में चर्चा के दौरान डॉ ० डी ० एन ० सिंह प्रांत प्रमुख विद्वत परिषद् , विद्या भारती झारखंड ने अन्न की महत्ता एवं जीवन में अन्न की उपयोगिता एवं महत्त्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा की अन्न केवल भोजन नहीं बल्कि शारीरिक एवं मानसिक विकास का भी प्रमुख कारक तत्व है। इसी सत्र के छात्र गतिविधि सत्र का संचालन प्रो ० रश्मि ने किया जिन्होंने कार्यशाला में उपस्तिथ विद्यार्थियों के साथ अन्न मय कोश से जुड़ी विभिन्न गतिविधियां करवायी। कार्यशाला का दूसरा सत्र प्राणमयकोश का रहा जिसमें प्रतिभागियों को प्राण , प्राणायाम और श्वास तंत्र के बारे में जानकारी प्रदान की गयी। विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए डॉ ० प्रशांत जयवर्धन ने प्राण एवं प्राणमय कोश के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी दी। उन्होंने पंच कोश में प्राणमय कोश के महत्त्व एवं अन्य कोश की साथ उसके संबंधों पर प्रकाश डाला। प्राणमय कोश विद्यार्थी गतिविधि सत्र का संचालन शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के प्रांत संयोजक महेंद्र कुमार सिंह ने किया। उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए प्राणमय कोश विकास के लिए विद्यार्धियों से प्राणायाम, मुद्रा और बंध का अभ्यास करवाया।
कार्यशाला के दूसरे दिन मनोमय कोश एवं विज्ञानमय कोश पर आधारित विचार एवं गतिविधियाँ साझा की गयी। मनोमय कोश विकास पर डॉ ० ललिता राणा , प्राध्यापक आनंदा कॉलेज ( प्रांत संयोजक चरित्र निर्माण ) एवं प्रो ० राजन तिवारी ने विचार प्रस्तुत किया एवं मनोमय कोश से जुड़ी गतिविधियाँ आयोजित की।
विज्ञानमय कोश सत्र में कुलाधिपति प्रो. (डॉ.) सविता सेंगर और डॉ. के.पी. दत्ता ने संबोधित करते हुए बताया कि विज्ञानमय कोश बुद्धि, विवेक और निर्णय क्षमता का स्तर है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्तित्व परिपक्व नहीं होता, तो निर्णय मूल्यों के बजाय स्वार्थ से प्रभावित होते हैं, जिससे समाज में विश्वास की कमी पैदा होती है। विज्ञानमय कोश का विकास व्यक्ति में तटस्थता, पारदर्शिता और स्पष्ट निर्णय क्षमता को मजबूत करता है।
कुलाधिपति महोदया का विचार–प्रवर्तक व्याख्यान :
कुलाधिपति महोदया ने कहा कि पंचकोश केवल शरीर की परतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्तित्व के सूक्ष्म आयामों को समझने का माध्यम है। उन्होंने समझाया कि विज्ञानमय कोश वह स्तर है जहाँ बुद्धि, विवेक और निर्णय क्षमता विकसित होती है। अनेक बार लोग बिना परिणामों पर विचार किए आदत या भावनाओं के प्रभाव में निर्णय ले लेते हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि व्यवहारिक जीवन में लोग डॉक्टरों और वकीलों पर इसलिए भरोसा नहीं कर पाते क्योंकि कभी–कभी डॉक्टर दवा कंपनियों के दबाव में दवाइयाँ लिख देते हैं और वकील आर्थिक लाभ के लिए सच को मोड़ देते हैं। यह समस्या पेशों की नहीं, बल्कि व्यक्तित्व–विकास की कमी का परिणाम है। उन्होंने कहा कि विश्वास वहीं बनता है जहाँ पारदर्शिता और ईमानदारी हो। विज्ञानमय कोश का विकास व्यक्ति को न अंध–विश्वास में जीने देता है और न संदेह में; बल्कि तथ्य, विवेक और तटस्थ दृष्टि से निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि गलतियाँ होना समस्या नहीं, लेकिन वही गलती दोबारा न दोहराना ही वास्तविक सीख है। जीवन में अपना मार्ग स्वयं चुनना चाहिए और दूसरों से तुलना के बजाय आत्म–विकास पर ध्यान देना चाहिए।
दूसरे दिन का अंतिम सत्र आनंद मय कोश का रहा जिसमें जीवन में आनंद एवं पंच कोश में आनंद विषय पर डॉ ० अमरकांत झा , क्षेत्रीय संयोजक चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व का समग्र विकास शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास एवं प्रो ० ओम प्रकाश सत्यम ने व्याख्यान एवं गतिविधि आयोजित किया।
इसमें बताया गया कि आनंद बाहरी परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि आंतरिक स्थिरता और मूल्य–आधारित जीवन पर निर्भर करता है। समूह चर्चा और अनुभव–विनिमय के आधार पर आगे की कार्ययोजना तैयार की गई, जिसमें प्रतिभागियों ने अपने-अपने संस्थानों में चरित्र–निर्माण और भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित गतिविधियों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
कार्यशाला का तीसरा एवं समापन दिवस का पहला सत्र गट सह चर्चा एवं आगामी कार्य योजना आधारित रखा गया था जिसमें सभी पांच कोश के विद्यार्थी एवं कोश प्रभारियों ने अपने अपने विचार कथन रखे। इस दौरान कोश विकास से जुड़ी आगामी कार्य योजना भी प्रस्तुत की गयी। कार्यशाला का समापन सत्र अनुभव कथन एवं समहू चर्चा पर केंद्रित रखा गया था। समापन सत्र को डॉ. विजय सिंह, डीन ( योजना एवं विकास ) सह क्षेत्र संयोजक शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास , डॉ. अमृता मजूमदार, कुल सचिव झारखंड राय विश्वविद्यालय , डॉ ० हरमीत कौर डीन ( मैनेजमेंट ) डॉ. सुमित पांडेय , डीन अकादमिक नेतृत्व ने सम्बोधित किया। इस दौरान तीन दिनों तक पंचकोश चर्चा एवं गतिविधियों में प्रतिभागियों की सक्रिय सहभागिता की सबने सराहना की। इस दौरान सभी ने कहा की तीन दिनों तक चले इस संवाद और प्रशिक्षण ने न केवल ज्ञान का विस्तार किया, बल्कि जीवन–दृष्टि को भी नई दिशा प्रदान की। कार्यशाला ने यह संदेश स्थापित किया कि शिक्षा का लक्ष्य केवल पेशेवर उत्कृष्टता नहीं, बल्कि संवेदनशील, सजग और मूल्यनिष्ठ समाज का निर्माण है।
तीन दिनों तक आयोजित कार्यशाला का सफल संचालन प्रो ० अनुराधा शर्मा , प्रो ० रागिनी कुमारी , डॉ ० कुमार अमरेंद्र ( कौटिल्य ज्ञान केंद्र ) एवं प्रो ० विक्रांत रवि ने किया।