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झारखंड राय विश्वविद्यालय में चरित्र निर्माण पर तीन दिवसीय कार्यशाला प्रारंभ

झारखंड राय विश्वविद्यालय रांची में शनिवार से तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला ” चरित्र निर्माण एवं चरित्र का सम्पूर्ण विकास ” प्रारंभ हुआ। कार्यशाला का विधिवत उद्घाटन दीप प्रज्जवलित कर गणेश वंदना के साथ किया गया। दीप प्रज्जवलन शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ ० अतुल भाई कोठारी, झारखंड राय विश्वविद्यालय की कुलाधिपति प्रो ० ( डॉ ०) सविता सेंगर, स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय, सागर के कुलाधिपति डॉ० अजय कुमार तिवारी, प्रो ० (डॉ ०) पीयूष रंजन कुलपति झारखंड राय विश्वविद्यालय, डॉ० मनोहर भंडारी, प्रो ० (डॉ ०) विजय कुमार सिंह डीन सरला बिरला विश्वविद्यालय, अमर कांत झा क्षेत्रीय संयोजक न्यास ने सामूहिक रूप से किया।

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कार्उयशाला के उद्घाटन सत्र का स्वागत भाषण करते कुलाधिपति प्रो ० (डॉ ०) सविता सेंगर ने कहा की चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास विषय पर आयोजित यह कार्यशाला भारतीय ज्ञान परंपरा एवं भारतीय दृष्टिकोण को समझने का प्रयास है। विश्वविद्यालय ने अप्रैल महीने में परिसर में कौटिल्य ज्ञान केंद्र भी स्थापित किया है। यह केंद्र भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय दृष्टिकोण को व्यक्त करने का केंद्र है। कार्यशाला के आयोजन के उद्देश्यों की चर्चा करते हुए कुलाधिपति ने कहा की व्यक्तित्व का अर्थ बहरी सुंदरता नहीं है जब हम भारतीय ज्ञान परंपरा और पंच कोश की बात करते हैं तो भारतीय दृष्टिकोण को उसमें शामिल करना होगा। न्यास के इस विषय पर बनाये गए पाठ्यक्रम को भी विश्वविद्यालय ने अपनाया है। चरित्र निर्माण एवं चरित्र का सम्पूर्ण विकास पाठ्यक्रम प्रारंभ करने का उद्देश्य है विद्यार्थियों में समाज एवं राष्ट्र के प्रति सकारात्मक सोच का भाव पैदा करना । यह भाव विद्यार्थियों के व्यक्तित्व में नजर आना चाहिए की वह समाज, राष्ट्र, स्वयं के लिए कितना सोचते है। कुलाधिपति प्रो ० सेंगर ने कहा कार्यशाला में अगले दो दिनों तक इसी विषय पर चर्चा होगी।

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कार्यशाला के मुख्य वक्ता शिक्षाविद एवं न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ० अतुल भाई कोठारी ने अपना संबोधन पंचकोश की अवधारणा के साथ प्रारम्भ किया। उन्होंने विस्तार पूर्वक अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमया कोश, विज्ञानमय कोश एवं आनंदमय कोश की चर्चा की।

उन्होंने कहा की पंचकोश, भारतीय दर्शन में मानव शरीर की पांच परतों या आवरणों को दर्शाता है,ये कोश शारीरिक, मानसिक, और आध्यात्मिक स्तरों पर मानव अस्तित्व को समझने में मदद करते हैं। पंचकोशों के अंदर ही हमारी तीनों प्रकार की चेतना यानि चेतन, अवचेतन और अचेतन विचरण करती है। ये पांच कोश एक-दूसरे से बहुत ही गहरे रूप में जुड़ी हुई हैं और अध्यात्म में जब लोग जैसे-जैसे गहराई में उतरते हैं, वह एक-एक करके सभी कोशों के प्रति जागरूक होते जाते हैं।पंचकोशों की अवधारणा मानव अस्तित्व को समझने और आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ने के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक है। डॉ० कोठारी ने अपने संबोधन के दौरान मंत्र , योग विद्या एवं आचरण और व्यवहार पर भी विस्तार पूर्वक बातें रखी।

कार्यशाला का दूसरा एवं तीसरा सत्र अन्नमय कोश एवं प्राणमय कोश विषय पर केन्द्रित था जिसके मुख्य वक्ता डॉ० मनोहर भंडारी थे। डॉ० भंडारी चिकित्सक के साथ हिंदी भाषा उत्थान के लिए भी कई महत्वपूर्ण कार्य किये हैं। उन्होंने अन्नमय कोश एवं प्राणमय कोश पर विस्तार से अपनी बातें रखते हुए बताया की शरीर, भोजन (अन्न) से पोषित होता है। यह कोश मानव शरीर का भौतिक रूप है जो भोजन से पोषित होता है और अन्य कोशों के साथ मिलकर मानव अस्तित्व का निर्माण करता है। चिकित्सा पद्धतियों की पहुच स्थूल शरीर तक है जबकी कितने ही रोग ऐसे हैं जो अन्नमय कोश की विकृति के कारण उत्पन्न होते हैं और जिसे चिकित्सक ठीक करने मे प्रायः असमर्थ हो जाते हैं प्राणमय कोश की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा की प्राणमय कोश, शरीर का दूसरा आवरण या परत है, जो ऊर्जा से संबंधित है। इसे जीवन शक्ति से बना हुआ माना जाता है, और यह भौतिक शरीर में मौजूद होता है, जो पूरे जीव में व्याप्त है।

उन्होंने अपने लम्बे चिकित्सीय अनुभव के साथ पंच कोश को जोड़ते हुए विस्तार पूर्वक कई बातें बताई। कार्यशाला के प्रथम दिन के चौथे सत्र को स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय , सागर के कुलाधिपति डॉ० अजय कुमार तिवारी ने संबोधित किया। उन्होंने मनो मया कोश पर अपनी बातें रखी इस दौरान उन्होंने मनो मया कोश में मन की अवधारणा पर भारतीय दर्शन और चिंतकों के विचारों से अवगत कराने का कार्य किया।