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स्प्रिंकलर सिंचाई में पानी की खपत हो कम और किसानों को मिले भरपूर फसल

झारखण्ड राय यूनिवर्सिटी, रांची के द्वारा उन्नत कृषि को बढ़ावा देने के लिए कई कार्य किये जा रहे है इनमें शामिल है स्प्रिंकलर सिंचाई तकनीक के जरिये किया जाने वाला कृषि कार्य। इस तकनीक से कैसे खेती करते हुए ज्यादा फसल प्राप्त करें इसका लाभ आस-पास रहने वाले किसानो को भी मिल रहा है। उन्नत कृषि को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा ड्रिप एरिगेशन, मल्चिंग, पोली हाउस, स्प्रिंकलर सिंचाई का प्रचार प्रसार भी किया है।

किसानों को उन्नत फसल और तकनीक की जानकारी प्रदान करने में यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ़ एग्रीकल्चर साइंस के अनुभवी शिक्षकों का लाभ भी किसानों को मिलता रहता है। झारखण्ड राय यूनिवर्सिटी नामकुम कैंपस में बेहत उन्नत तकनीक का हाइड्रोफोनिक्स लैब भी स्थापित है जहाँ स्टूडेंट्स को प्रशिक्षण पूरा करने पर प्रमाणपत्र भी उपलब्ध करवाया जाता है।

स्प्रिंकलर सिंचाई तकनीक ड्रिप सिंचाई की तरह ही बूंद बूंद सिंचाई तकनीक है।इसे बौछारी सिंचाई भी कहा जाता है। इसमें पानी पौधों के जड़ों में नहीं जाकर वर्षा के फुहारों की तरह गिरता है। यह सिंचाई करने का आधुनिक तरीका है। इसमें छिद्र वाली नालियों से जल का प्रवाह किया जाता है और फिर फुहारों की तरह पानी की बूंदें पौधों पर गिरती है। इसमें मुख्य तत्व मोटर पंप, पाइप फ़िल्टर ,पाइप की मुख्य नली, बौछार करने वाली पाइप की नली और पानी फेखने वाला फुहारा है। इनकी सहायता से ही स्प्रिंकलर कार्य करता है।

स्प्रिंकलर का पानी छिड़कने वाला नॉजील हमेशा घूमता रहता है जिससे आस -पास के पौधों पर पानी की फुहार पड़ती रहती है। स्प्रिंकलर सेट को एक जगह से दूसरी जगह आसानी से ले जाया जा सकता है। इसका मतलब है इसे एक खेत से दूसरे खेत में आसानी से शिफ्ट कर सकते है और सिंचाई के काम को कर सकते है।

बौछार सिंचाई प्रणाली के मुख्य घटक :

बौछारी सिंचाई पद्धती मे मुख्य भाग पम्प, मुख्य नली, बगल कि नली, पानी उठाने वाली नली एंव पानी छिडकाव वाला फुहारा होता है |
बौछार सिंचाई प्रणाली कि क्रिया विधि :

बौछारी सिंचाई में नली में पानी दबाव के साथ पम्प द्वारा भेजा जाता है जिससे फसल पर फुहारा द्वारा छिडकाव होता है | मुख्य नली बगल कि नलियों से जुडी होती है | बगल कि नालियों में पानी उठाने वाली नली जुडी होती है |

पानी उठाने वाली नली जिसे राइजर पाइप कहते है इसकी लम्बाई फसल कि लम्बाई पर निर्भर करती है | क्योंकी फसल कि उंचाई जितनी रहती है राइजर पाइप उससे ह्मेशा उंचा रखना पड़ता है | इसे सामान्यत: फसल कि अधिकतम लम्बाई के बराबर होना चाहिए | पानी छिडकाव वाले हेड घुमने वाले होते है जिन्हें पानी उठाने वाले पाइप से लगा दिया जाता है |पानी छिडकने वाले यंत्र भूमि के पुरे क्षेत्रफल पर अर्थात फसल के उपर पानी छिडकते है | दबाव के कारण पानी काफी दूर तक छिडका जाता है जिससे सिंचाई होती है |

    स्प्रिंकलर सिंचाई की विशेषताएँ :

  • सिंचाई के दौरान मजदूरों पर होने वाले खर्च में कमी।
  • इस तकनीक की मदद से पानी के साथ -साथ समय की बचत होती है।
  • आवश्यकता के अनुसार फसल को पानी एक या दो दिन छोड़ कर दिया जाता है।
  • इस तकनीक का उपयोग उबर खाबर जमीन और कम पानी उपलब्धता वाली भूमि में किया जाता है।
  • यह सिंचाई तकनीक आसान और बेहद कम खर्च में उपलब्ध है।
  • इस तकनीक की मदद से काम पानी में ज्यादा भूमि पर सिंचाई की जा सकती है।
  • इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है की पानी की फुहारें पौधों की पत्तियों पर पड़ती है जिनसे पत्ते साफ़ रहते है और उन्हें अपना भोजन बनाने में आसानी होती है। इस कारण से पौधों का विकास भी होता है।
  • छिटकावा विधि से बोई गयी फसलों में यह तकनीक बेहतर मानी जाती है।
  • स्प्रिंकलर सिंचाई (Sprinkler Irrigation) के लाभ :
  • सतही सिंचाई मे पानी खेत तक पहुँचने मे 15-20 प्रतिशत तक अनुपयोगी रहता है |
  • सिंचाई में एकसा पानी नही पहुँचता जबकी बौछारी सिंचाई से संचित क्षेत्रफल 1.52 गुना बढ जाता है अर्थात इस विधि से सिंचाई करने पर 25-50 प्रतिशत तक पानी की सीधे बचत होती है |
  • जब पानी वर्षा कि भांती छिडकाया जाता है तो भूमि पर जल भराव नही होता है जीससे मिट्टी कि पानी सोखने कि दर कि अपेक्षा छिडकाव कम होने से पानी के बहने से हानी नही होती है |
  • जिन जगहों पर भूमि ऊची-नीची रहती है वहाँ पर सतही सिंचाई संभव नहीं हो पाती उन जगहों पर बौछारी सिंचाई वरदान साबित होती है |
  • बौछारी सिंचाई बलुई मिट्टी एव अधिक ढाल वाली तथा उची-नीची जगहों के लिए उपयुक्त विधि है | इन जगहो पर सतही विधि से सिंचाई नही कि जा सकती है |
  • इस विधि से सिंचाई करने पर मिट्टी में नमी का उपयुक्त स्तर बना रहता है जिसके कारण फसल कि वृद्धी उपज और गुणवत्ता अच्छी रहती है |
  • इस विधि मे सिंचाई के पानी के साथ घुलनशील उर्वरक, कीटनाशी तथा जीवनाशी या खरपतवारनाशी दवाओं का भी प्रयोग आसानी से किया जा सकता है|
  • पाला पड़ने से पहले बौछारी सिंचाई पद्धती से सिंचाई करने पर तापक्रम बढ जाने से फसल को पाले से नुकसान नही होता है |
  • पानी कि कमी, सीमित पानी कि उपलब्धता वाले क्षेत्रो मे दुगुना से तीन गुना क्षेत्रफल सतही सिंचाई कि अपेक्षा किया जा सकता है|
    स्प्रिंकलर सिंचाई का रखरखाव एवं सावधानियाँ :

  • सिंचाई के प्रयोग के समय एवं प्रयोग के बाद परीक्षण कर लेना चाहिए और कुछ मुख्य सावधानियाँ रखने से स्प्रिंकलर सेट अच्छी तरह चलता है |
  • प्रयोग होने वाला सिंचाई जल स्वच्छ तथा बालू एवं अत्यधिक मात्रा घुलनशील तत्वो से युक्त नही होना चाहीए |
  • उर्वरको, फफुंदी / खरपतवारनाशी आदी दवाओं के प्रयोग के पश्चात सम्पूर्ण प्रणाली को स्वच्छ पानी से सफाई कर लेना चाहीए |
  • प्लास्टिक वाशरो को आवश्यकतानुसार निरीक्षण करते रहना चाहिए और बदलते रहना चाहीए |
  • रबर सील को साफ रखना चाहीए तथा प्रयोग के बाद अन्य फिटिंग भागों को अलग कर साफ करने के उपरान्त शुष्क स्थान पर भण्डारीत करना चाहीए |