Archives

Yoga day JRU 2025

योग: शरीर, मन और आत्मा का संगम

“योग वह विज्ञान है जो मनुष्य को स्वयं से मिलवाता है, और भीतर के मौन में सच्ची शांति का अनुभव कराता है।”

— स्वामी विवेकानंद

मैं अपनी बात की शुरुआत एक छोटी-सी कविता से करना चाहती हूँ —
एक ऐसी कविता जो योग के सार को महसूस करने में मदद करती है,क्योंकि मेरे लिए योग सिर्फ एक अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन का एहसास है।

योग का प्रकाश

साँसों की लय में जब शांति उतरती है,
मन की लहरें धीरे ठहरती हैं।
तन की थकन, मन का भ्रम मिटता है,
योग से जीवन पुनः खिलता है।

सूर्य नमस्कार में नई ऊर्जा आती है,
ध्यान में आत्मा मुस्कुराती है।
हर आसन कहे – यह मार्ग अनोखा है,
योग ही जीवन की सच्ची रोशनी का झरोखा है।

प्रस्तावना

भारतीय संस्कृति की सबसे प्राचीन और समृद्ध देनों में से एक है — योग। यह केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुशासन (spiritual discipline) है जो शरीर, मन और आत्मा को एक सूत्र में बाँधता है। संस्कृत शब्द ‘योग’ का अर्थ है — “संयोजन” या “एकता”। यह व्यक्ति को स्वयं से, समाज से और परमात्मा से जोड़ने का माध्यम है।

आज जब दुनिया तनाव, चिंता और असंतुलन से जूझ रही है, तब योग जीवन में शांति, संतुलन और सकारात्मकता का संदेश देता है।

योग का ऐतिहासिक और दार्शनिक आधार

योग का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। इसका उल्लेख ऋग्वेद, उपनिषदों और भगवद्गीता में मिलता है।
लेकिन योग को एक व्यवस्थित दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया गया पतंजलि ऋषि द्वारा, जिन्होंने “योगसूत्र” की रचना की।

पतंजलि के अनुसार —

“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”
(योग मन की वृत्तियों का निरोध है।)

अर्थात् योग वह साधन है जो मन के उतार-चढ़ाव को शांत कर आत्मा को स्थिर बनाता है।

अष्टांग योग: जीवन जीने की कला

पतंजलि ने योग को आठ अंगों में बाँटा — जिसे अष्टांग योग कहा जाता है:

  1. यम – नैतिक अनुशासन (अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि)
  2. नियम – आत्मसंयम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान)
  3. आसन – शरीर को स्थिर और स्वस्थ रखने की विधि
  4. प्राणायाम – श्वास-प्रश्वास का नियंत्रण
  5. प्रत्याहार – इंद्रियों पर नियंत्रण
  6. धारणा – एकाग्रता का अभ्यास
  7. ध्यान – गहन मनन और ध्यान
  8. समाधि – आत्मा का परमात्मा में लय

इन आठों चरणों से योगी धीरे-धीरे आत्म-ज्ञान और मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।

योग और मानसिक स्वास्थ्य

आधुनिक जीवन में तनाव, चिंता, अवसाद और अनिद्रा जैसी समस्याएँ सामान्य हो गई हैं। योग इन मानसिक विकारों से निपटने का एक प्राकृतिक और स्थायी समाधान प्रदान करता है।

नियमित योगाभ्यास से —

  • मन शांत होता है,
  • विचारों में स्पष्टता आती है,
  • भावनाओं पर नियंत्रण रहता है,
  • और आत्मविश्वास बढ़ता है।

कई वैज्ञानिक शोधों ने सिद्ध किया है कि योग कॉर्टिसोल (stress hormone)को कम करता है और सिरोटोनिन (happiness hormone) को बढ़ाता है।

योग का वैश्विक प्रसार

21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (International Yoga Day) के रूप में मनाना इस बात का प्रमाण है कि योग अब केवल भारत की संपत्ति नहीं, बल्कि विश्व की धरोहर बन चुका है।

संयुक्त राष्ट्र ने इसे भारत की पहल पर 2015 से वैश्विक स्तर पर मान्यता दी।

आज न्यूयॉर्क से लेकर टोक्यो तक, लाखों लोग योग के माध्यम से स्वास्थ्य और आत्मिक शांति प्राप्त कर रहे हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा में योग का स्थान

भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल लक्ष्य रहा है — “सर्वे भवन्तु सुखिनः” यानी सबका कल्याण।
योग इसी भावना का विस्तार है — यह केवल व्यक्ति को स्वस्थ नहीं करता, बल्कि समाज में सद्भाव, संतुलन और करुणा की भावना जगाता है।

योग को हमारे वेद, उपनिषद और गीता ने **कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग** जैसे विविध रूपों में प्रस्तुत किया है — जो दर्शाता है कि योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि **सम्पूर्ण जीवन का दर्शन** है।

निष्कर्ष

योग केवल शरीर की मुद्रा नहीं, यह **मन की स्थिरता और आत्मा की जागरूकता** की साधना है।
यह हमें सिखाता है कि सच्ची खुशी बाहरी चीज़ों में नहीं, बल्कि **अंतर की शांति** में है।

“योगः कर्मसु कौशलम्” — भगवद्गीता
अर्थात् — योग जीवन के प्रत्येक कर्म को कुशलता और संतुलन से करने की कला है।

इसलिए, आज के युग में योग को अपनाना केवल स्वास्थ्य का उपाय नहीं, बल्कि **जीवन का उत्सव** है — जहाँ शरीर, मन और आत्मा एक साथ मुस्कुराते हैं।

समापन संदेश:

भारतीय ज्ञान परंपरा का यह उपहार हमें याद दिलाता है कि योग केवल भारत की प्राचीन विद्या नहीं, बल्कि मानवता के कल्याण का मार्ग है।
आइए, हम सब योग को अपने जीवन का हिस्सा बनाकर शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पूर्णता की ओर कदम बढ़ाएँ।

लेखक: रीमशा उरुज़
छात्रा, झारखण्ड राय विश्वविद्यालय

Workshop on Character building through Panchakosha theory (10)

चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व का समग्र विकास विषय पर तीन दिवसीय कार्यशाला संपन्न

झारखंड राय विश्वविद्यालय, रांची में 20 से 22 नवंबर 2025 तक चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व का समग्र विकास विषय पर विद्यार्थी प्रतिनिधि केंद्रित तीन दिवसीय कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा के माध्यम से विद्यार्थियों और शिक्षकों के समग्र व्यक्तित्व विकास को समझना और उसे जीवन में व्यावहारिक रूप से लागू करना था। इस दौरान पंचकोश अवधारणा (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश ) पर आधारित शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास विकास पर जोर रहा।

उद्घाटन सत्र :

उद्घाटन सत्र में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी, प्रो. (डॉ.) गौतम सूत्रधार, निदेशक, एनआईटी जमशेदपुर कुलाधिपति प्रो. (डॉ.) सविता सेंगर झारखंड राय विश्वविद्यालय, रांची और कुलपति प्रो. (डॉ.) पीयूष रंजन की गरिमामयी उपस्थिति रही। सत्र के मुख्य वक्ता डॉ. कोठारी ने कार्यक्रम की शुरुआत ॐ तथा “तमसो मा ज्योतिर्गमय” मंत्र के सामूहिक उच्चारण से करवाई और विद्यार्थियों से अनुभव साझा करने को कहा। उन्होंने बताया कि यदि किसी कक्षा की शुरुआत ॐ से हो, तो वातावरण शांत रहता है, मन स्थिर होता है और एकाग्रता स्वाभाविक रूप से बढ़ती है। उन्होंने विद्यार्थियों से यह भी पूछा कि कौन–कौन सुबह अपने इष्ट देवता का स्मरण करके आता है, और सुझाव दिया कि उसी समय ॐ का उच्चारण मानसिक संतुलन के लिए अत्यंत लाभकारी है।

चरित्र निर्माण पर बोलते हुए उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचार “Good habit is value” का उल्लेख किया और कहा कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे बड़ों को करते हुए देखते हैं। एक चोर की कहानी के माध्यम से उन्होंने समझाया कि छोटी गलतियों पर समय रहते रोक लगाने से बड़े अपराध टल सकते हैं, इसलिए प्रारंभिक जीवन में सही दिशा देना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि घरेलू कार्य—जैसे झाड़ू–पोंछा या अपने कार्य स्वयं करना—व्यायाम का ही रूप हैं और आत्मनिर्भरता बढ़ाते हैं। जापान का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहाँ लोग अपना काम स्वयं करते हैं और यही आदतें राष्ट्रीय चरित्र का आधार बनती हैं।

पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता की जिम्मेदारी और प्राणायाम के महत्व को उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया।

डॉ. कोठारी ने छात्र-प्रतिनिधियों से अपेक्षा की कि वे कार्यशाला से प्राप्त सीख को अपने साथियों तक पहुँचाएँ और भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों को व्यवहार में उतारने में अग्रणी भूमिका निभाएँ। सत्र के अंत में विश्वविद्यालय की अर्धवार्षिक पत्रिका ‘संवित्’ का लोकार्पण किया गया।

पत्रिका लोकार्पण के उपरांत विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति में लोह-निर्माण भट्टी का उद्घाटन किया गया। इस अवसर पर डॉ. अतुल कोठारी ने भट्टी की निर्माण प्रक्रिया, इसके पारंपरिक और वैज्ञानिक पक्षों तथा भारतीय धातु-विज्ञान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझा। एनआईटी जमशेदपुर के प्रो. (डॉ.) गौतम सूत्रधार, झारखंड राय विश्वविद्यालय की कुलाधिपति प्रो. (डॉ.) सविता सेंगर तथा कुलपति प्रो. (डॉ.) पीयूष रंजन भी इस महत्वपूर्ण क्षण में उपस्थित रहे। अतिथियों ने इसे अनुभव–आधारित शिक्षण का सशक्त उदाहरण बताते हुए कहा कि ऐसे प्रयास विद्यार्थियों में अनुसंधान, स्वदेशी तकनीकों की समझ और नवाचार के प्रति रुचि विकसित करते हैं।

पंचकोश आधारित सत्र :

कार्यशाला के पहले दिन अन्नमय एवं प्राणमय कोश से जुड़े सत्र में भोजन और स्वास्थ्य के वैज्ञानिक संबंध, श्वास–प्रश्वास तथा ऊर्जा–संतुलन, और भावनात्मक स्थिरता जैसे विषयों पर चर्चा की गई। अन्नमय कोश सत्र में चर्चा के दौरान डॉ ० डी ० एन ० सिंह प्रांत प्रमुख विद्वत परिषद् , विद्या भारती झारखंड ने अन्न की महत्ता एवं जीवन में अन्न की उपयोगिता एवं महत्त्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा की अन्न केवल भोजन नहीं बल्कि शारीरिक एवं मानसिक विकास का भी प्रमुख कारक तत्व है। इसी सत्र के छात्र गतिविधि सत्र का संचालन प्रो ० रश्मि ने किया जिन्होंने कार्यशाला में उपस्तिथ विद्यार्थियों के साथ अन्न मय कोश से जुड़ी विभिन्न गतिविधियां करवायी। कार्यशाला का दूसरा सत्र प्राणमयकोश का रहा जिसमें प्रतिभागियों को प्राण , प्राणायाम और श्वास तंत्र के बारे में जानकारी प्रदान की गयी। विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए डॉ ० प्रशांत जयवर्धन ने प्राण एवं प्राणमय कोश के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी दी। उन्होंने पंच कोश में प्राणमय कोश के महत्त्व एवं अन्य कोश की साथ उसके संबंधों पर प्रकाश डाला। प्राणमय कोश विद्यार्थी गतिविधि सत्र का संचालन शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के प्रांत संयोजक महेंद्र कुमार सिंह ने किया। उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए प्राणमय कोश विकास के लिए विद्यार्धियों से प्राणायाम, मुद्रा और बंध का अभ्यास करवाया।

कार्यशाला के दूसरे दिन मनोमय कोश एवं विज्ञानमय कोश पर आधारित विचार एवं गतिविधियाँ साझा की गयी। मनोमय कोश विकास पर डॉ ० ललिता राणा , प्राध्यापक आनंदा कॉलेज ( प्रांत संयोजक चरित्र निर्माण ) एवं प्रो ० राजन तिवारी ने विचार प्रस्तुत किया एवं मनोमय कोश से जुड़ी गतिविधियाँ आयोजित की।

विज्ञानमय कोश सत्र में कुलाधिपति प्रो. (डॉ.) सविता सेंगर और डॉ. के.पी. दत्ता ने संबोधित करते हुए बताया कि विज्ञानमय कोश बुद्धि, विवेक और निर्णय क्षमता का स्तर है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्तित्व परिपक्व नहीं होता, तो निर्णय मूल्यों के बजाय स्वार्थ से प्रभावित होते हैं, जिससे समाज में विश्वास की कमी पैदा होती है। विज्ञानमय कोश का विकास व्यक्ति में तटस्थता, पारदर्शिता और स्पष्ट निर्णय क्षमता को मजबूत करता है।

कुलाधिपति महोदया का विचार–प्रवर्तक व्याख्यान :

कुलाधिपति महोदया ने कहा कि पंचकोश केवल शरीर की परतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्तित्व के सूक्ष्म आयामों को समझने का माध्यम है। उन्होंने समझाया कि विज्ञानमय कोश वह स्तर है जहाँ बुद्धि, विवेक और निर्णय क्षमता विकसित होती है। अनेक बार लोग बिना परिणामों पर विचार किए आदत या भावनाओं के प्रभाव में निर्णय ले लेते हैं।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि व्यवहारिक जीवन में लोग डॉक्टरों और वकीलों पर इसलिए भरोसा नहीं कर पाते क्योंकि कभी–कभी डॉक्टर दवा कंपनियों के दबाव में दवाइयाँ लिख देते हैं और वकील आर्थिक लाभ के लिए सच को मोड़ देते हैं। यह समस्या पेशों की नहीं, बल्कि व्यक्तित्व–विकास की कमी का परिणाम है। उन्होंने कहा कि विश्वास वहीं बनता है जहाँ पारदर्शिता और ईमानदारी हो। विज्ञानमय कोश का विकास व्यक्ति को न अंध–विश्वास में जीने देता है और न संदेह में; बल्कि तथ्य, विवेक और तटस्थ दृष्टि से निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि गलतियाँ होना समस्या नहीं, लेकिन वही गलती दोबारा न दोहराना ही वास्तविक सीख है। जीवन में अपना मार्ग स्वयं चुनना चाहिए और दूसरों से तुलना के बजाय आत्म–विकास पर ध्यान देना चाहिए।

दूसरे दिन का अंतिम सत्र आनंद मय कोश का रहा जिसमें जीवन में आनंद एवं पंच कोश में आनंद विषय पर डॉ ० अमरकांत झा , क्षेत्रीय संयोजक चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व का समग्र विकास शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास एवं प्रो ० ओम प्रकाश सत्यम ने व्याख्यान एवं गतिविधि आयोजित किया।

इसमें बताया गया कि आनंद बाहरी परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि आंतरिक स्थिरता और मूल्य–आधारित जीवन पर निर्भर करता है। समूह चर्चा और अनुभव–विनिमय के आधार पर आगे की कार्ययोजना तैयार की गई, जिसमें प्रतिभागियों ने अपने-अपने संस्थानों में चरित्र–निर्माण और भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित गतिविधियों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

कार्यशाला का तीसरा एवं समापन दिवस का पहला सत्र गट सह चर्चा एवं आगामी कार्य योजना आधारित रखा गया था जिसमें सभी पांच कोश के विद्यार्थी एवं कोश प्रभारियों ने अपने अपने विचार कथन रखे। इस दौरान कोश विकास से जुड़ी आगामी कार्य योजना भी प्रस्तुत की गयी। कार्यशाला का समापन सत्र अनुभव कथन एवं समहू चर्चा पर केंद्रित रखा गया था। समापन सत्र को डॉ. विजय सिंह, डीन ( योजना एवं विकास ) सह क्षेत्र संयोजक शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास , डॉ. अमृता मजूमदार, कुल सचिव झारखंड राय विश्वविद्यालय , डॉ ० हरमीत कौर डीन ( मैनेजमेंट ) डॉ. सुमित पांडेय , डीन अकादमिक नेतृत्व ने सम्बोधित किया। इस दौरान तीन दिनों तक पंचकोश चर्चा एवं गतिविधियों में प्रतिभागियों की सक्रिय सहभागिता की सबने सराहना की। इस दौरान सभी ने कहा की तीन दिनों तक चले इस संवाद और प्रशिक्षण ने न केवल ज्ञान का विस्तार किया, बल्कि जीवन–दृष्टि को भी नई दिशा प्रदान की। कार्यशाला ने यह संदेश स्थापित किया कि शिक्षा का लक्ष्य केवल पेशेवर उत्कृष्टता नहीं, बल्कि संवेदनशील, सजग और मूल्यनिष्ठ समाज का निर्माण है।

तीन दिनों तक आयोजित कार्यशाला का सफल संचालन प्रो ० अनुराधा शर्मा , प्रो ० रागिनी कुमारी , डॉ ० कुमार अमरेंद्र ( कौटिल्य ज्ञान केंद्र ) एवं प्रो ० विक्रांत रवि ने किया।

Indian Knowledge Systems and Mathematics The Intellectual Journey of a Computer Science Researcher

भारतीय ज्ञान प्रणाली और गणित: एक कंप्यूटर विज्ञान शोधार्थी की बौद्धिक यात्रा

“कभी-कभी एक प्रश्न ही रास्ता खोल देता है, और उस पर चलने की जिज्ञासा जीवन बदल देती है।”

मेरी यह यात्रा भी एक ऐसे ही प्रश्न से शुरू हुई — “कंप्यूटर विज्ञान जैसे आधुनिक विषय से, क्या वाकई मैं हजारों वर्षों पुरानी भारतीय ज्ञान प्रणाली को जोड़ सकता हूँ?”

जब मुझे पहली बार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) द्वारा आयोजित 6-दिवसीय भारतीय ज्ञान प्रणाली के प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर मिला, मन में उत्साह तो था, लेकिन साथ ही शंका भी थी।

एक ओर भारतीय ज्ञान प्रणाली — ऋषियों की गहराई से उपजी वह विरासत, जो वेदों, गणित, खगोल, दर्शन, साहित्य, नृत्य और आयुर्वेद से समृद्ध है; और दूसरी ओर कंप्यूटर विज्ञान — आज की डिजिटल क्रांति का सबसे प्रमुख स्तंभ। दोनों के बीच की दूरी मुझे शुरुआत में असंभव-सी लगी। लेकिन जैसे-जैसे प्रशिक्षण आगे बढ़ा, मेरी सोच बदलने लगी।

6 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में जैसे ही मैंने भारतीय गणित पर आधारित सत्रों को ध्यानपूर्वक सुना, मेरी दृष्टि में परिवर्तन हुआ। मैंने जाना कि हमारे देश ने न केवल शून्य और दशमलव की खोज की, बल्कि गणना की विधियाँ, बीजगणित, त्रिकोणमिति, और खगोलगणित में भी अमूल्य योगदान दिया है।

आर्यभट्ट ने जिस खगोलगणित की नींव रखी, वह आज भी उपग्रहों की कक्षा निर्धारण में उपयोगी है।

पिंगलाचार्य के छंदशास्त्र में द्विआधारी गणना (द्वि-कोड प्रणाली) की झलक है, जिसे आज का कंप्यूटर विज्ञान अपनी नींव मानता है।

भास्कराचार्य की लीलावती पुस्तक में गणितीय अवधारणाएँ इतनी सरल भाषा में प्रस्तुत हैं कि वे आज के आधुनिक शिक्षण मॉडल से कहीं अधिक प्रभावी प्रतीत होती हैं।

मैं चकित था — क्या ये वही अवधारणाएँ हैं जिन पर आज कंप्यूटर विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के तर्क-आधारित तंत्र कार्य करते हैं?
इस प्रशिक्षण के पश्चात, मुझे भारत भर से चुने गए लगभग 1000 प्रतिभागियों में से मुख्य प्रशिक्षक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह मेरे लिए केवल सम्मान नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व भी था — एक ऐसा उत्तरदायित्व, जो इस विरासत को केवल समझने का नहीं, बल्कि इसे आज की शिक्षा प्रणाली और तकनीकी क्षेत्र से जोड़ने का था।
इसके पश्चात मुझे “गणित” विषय पर केंद्रित विषय-विशिष्ट प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर मिला, जिसने मेरी सोच को और भी वैज्ञानिक, सुसंगत और गहराई से जुड़ा हुआ बना दिया।

अब सवाल यह था — मैं कंप्यूटर विज्ञान से होने के नाते भारतीय ज्ञान प्रणाली को कैसे जोड़ सकता हूँ?

और यहीं पर मुझे उत्तर मिले — गणित और कंप्यूटर विज्ञान के बीच उस अदृश्य पुल की खोज, जो सदियों पहले हमारे ऋषियों द्वारा स्थापित किया गया था।

भारतीय गणित और कंप्यूटर विज्ञान के सेतु

  • क्रमविधि (एल्गोरिदम) और भारतीय ज्ञान प्रणाली:
    पिंगलाचार्य द्वारा प्रतिपादित छंद विन्यास में ‘लघु’ और ‘गुरु’ की गणना वास्तव में द्विआधारी कोडिंग (0 और 1) जैसी है।
  • पुनरावृत्ति विधियाँ (रीकरिंग मैथड्स) और चक्रवाल पद्धति:
    भास्कराचार्य की चक्रवाल विधि आज के आवर्तक क्रमविधि (इटरेटिव एल्गोरिदम) जैसी ही है।
  • फ्रैक्टल पैटर्न और मंदिर वास्तुकला:
    भारतीय मंदिरों की संरचना में प्रयुक्त गणितीय पैटर्न, आज के संगणक ग्राफ़िक्स और डिज़ाइनिंग में प्रयुक्त “स्वरूप ज्यामिति” (फ्रैक्टल ज्योमेट्री) से मिलते हैं।
  • डेटा वर्गीकरण और नवरस सिद्धांत:
    भारतीय सौंदर्यशास्त्र में वर्णित ‘नवरस’ की प्रणाली, आज की भावनात्मक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) मॉडलिंग में उपयोगी हो सकती है।

अर्थात् भारतीय ज्ञान प्रणाली, कंप्यूटर विज्ञान से केवल जुड़ती नहीं है — वह उसमें नव दृष्टिकोण, संवेदनशीलता, और भारतीयता का समावेश करती है।

आज मैं गौरव से कह सकता हूँ कि मुझे देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों में भारतीय ज्ञान प्रणाली विषय पर सत्र लेने का अवसर मिल रहा है।

  • विश्वविद्यालय अनुदान आयोग–शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशालाएँ
  • शिक्षकों के विकास कार्यक्रम (FDP.)
  • विषय-विशिष्ट अभिमुखीकरण सत्र
  • भारतीय ज्ञान प्रणाली जागरूकता एवं एकीकरण अभियान

इन सत्रों में मैं न केवल गणित और कंप्यूटर विज्ञान के शिक्षकों को प्रशिक्षण देता हूँ, बल्कि उन्हें यह विश्वास भी दिलाता हूँ कि भारतीय ज्ञान प्रणाली न केवल प्रासंगिक है, बल्कि अनिवार्य भी — यदि हम एक आत्मनिर्भर, मूल्यों पर आधारित, और नवाचार से परिपूर्ण शिक्षा प्रणाली चाहते हैं।

मेरी यह यात्रा बताती है कि प्राचीनता का अर्थ जड़ता नहीं होता, और आधुनिकता का अर्थ परंपरा से विमुख होना नहीं होता। यदि हम ध्यानपूर्वक देखें, तो भारतीय ज्ञान प्रणाली और कंप्यूटर विज्ञान के बीच गहरा तात्त्विक और व्यवहारिक संबंध मौजूद है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस ज्ञान को पुनः अपने शिक्षण, अनुसंधान और नवाचार में समाहित करें — तभी हम सच्चे अर्थों में “भारत को ज्ञान-विज्ञान की विश्वगुरु परंपरा से जोड़ने” की दिशा में आगे बढ़ पाएँगे।


लेखक:
डॉ. कुमार अमरेन्द्र
संकाय सदस्य, कंप्यूटर विज्ञान एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, झारखंड राय विश्वविद्यालय, रांची
मुख्य प्रशिक्षक, भारतीय ज्ञान प्रणाली, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, शिक्षा मंत्रालय

Mental Health The Invisible Burden of the Mind - JRU Blog KGK

मानसिक सेहत: मन का अदृश्य बोझ

(विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर विशेष)

मन का बोझ हमारे व्यक्तित्व का एक बड़ा रहस्य है। आजकल सभी लोग अपने शरीर का वजन घटाने में लगे हैं, लेकिन इस बात का हमें ख्याल ही नहीं आता कि शरीर के बोझ के अलावा हमारे मन पर भी, हमारे दिमाग पर भी हमेशा एक बोझ रहता है। जैसे शरीर बीमार होता है, हमारा मस्तिष्क भी बीमार होता या हो सकता है। हर साल की तरह इस वर्ष भी दस अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया गया। इस मौके पर हम बात करेंगे उस वजन की, जो दिखाई नहीं देता लेकिन हमारे जीवन पर, रोजाना की जिंदगी में उसका गहरा असर रहता है। यह वजन कई टन का होता है। कड़वा सच यह भी है कि शरीर की तरह मन का बोझ किसी दवाई से, इंजेक्शन से, किसी वर्कआउट से, जिम से या ट्रेडमिल पर चलने से कम नहीं होता।

कई बार यह बोझ उन लोगों को मानसिक तौर पर बीमार बना देता है जो बाहर से देखने में पूरी तरह फिट दिखते हैं क्योंकि यह बोझ भावनाओं का होता है, डर का होता है,टूटती उम्मीदों का होता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में 100 करोड़ से ज्यादा लोग मानसिक स्वास्थ्य (मेंटल हेल्थ) से जूझ रहे हैं। यह हिस्सा वैश्विक आबादी का लगभग 14% है। औसतन दुनिया में हर सात में से एक व्यक्ति किसी ना किसी मानसिक बीमारी का शिकार है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, यह एक वैश्विक आपदा है। मानसिक बोझ के भी कई स्तर हैं, उनमें से एक है – एंग्जायटी (बेचैनी) यानी भविष्य की चिंता। यह एक तरह का डर है जो हर पल हमें परेशान करता है कि भविष्य में क्या होगा, कल क्या होने वाला है।

एक आंकड़े के मुताबिक भारत में भी लगभग 20 करोड़ लोग किसी ना किसी मानसिक रोग से संघर्ष कर रहे हैं। इनमें से सिर्फ 10 से 15% लोग ही इसका इलाज करा पाते हैं। हमारे देश में 40 फीसदी युवाओं के लिए, टीनएजर्स के लिए टेंशन (तनाव) और एंग्जायटी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। आज हमें यह समझने की जरूरत है कि हम ही अपने सबसे सच्चे दोस्त हैं लेकिन हम अपने साथ कितना समय बिताते हैं, ज्यादातर लोगों के पास इसका उत्तर ना में होगा। हम भागते जा रहे हैं, रुकने का नाम ही नहीं ले रहे।

मानसिक सेहत को दुरुस्त रखने के लिए एक थेरेपी (चिकित्सा) है, यह है ठहरने की थेरेपी। जरा ठहरिए, जरा रुकिए और कुछ देर कुछ मत कीजिए। यह है कुछ ना करने की थेरेपी। इस इलाज में आपको कुछ नहीं करना और यह सबसे मुश्किल है। बड़ी मुश्किल है कुछ देर के लिए कुछ ना करना, कुछ ना कहना और कुछ ना सोचना। इसे आप एक चैलेंज की तरह लीजिए और वो चैलेंज है कुछ नहीं करने का चैलेंज, कुछ नहीं सोचने का चैलेंज। ना काम, ना बात, ना शोर, बस कुछ देर के लिए अपने साथ बैठिए बिल्कुल चुपचाप। यह सुनने में तो बड़ा आसान लगता है लेकिन यही सबसे मुश्किल है क्योंकि जब शरीर रुकता है तो मन भागने लगता है। लेकिन आज आप रुकिए क्योंकि रुकने का मतलब है खुद से मिलना। यह देखिए कि आपका मन कितनी देर तक ठहर सकता है।

अंत में बोझिल मन से लड़ने के लिए प्रेरित करने वाली कुछ पंक्तियाँ आपके साथ शेयर करता हूं।
हम सिर्फ घटाते हैं अपने शरीर का वजन,
जबकि सैकड़ों टन के बोझ से पिस रहा है हमारा मन।
फोन में सैकड़ों नंबर सजे पड़े हैं,
पर दर्द सुनने वाले कहीं दूर खड़े हैं।
सोशल मीडिया पर दोस्त हैं हजार,
फिर भी मन के भीतर है एक गहरी दरार।
सैकड़ों जख्मों से छिल चुका है मन,
अब कौन लगाए इन घावों पर मरहम।
थाम लीजिए अब अपने मन की डोर,
तभी तो आएगी जिंदगी में एक नई भोर।
शांति से साधिए अपने भीतर का मन, शांति से साधिए अपने भीतर का मन।

ध्यान दें: मानसिक परेशानी के समाधान के लिए भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने हेल्पलाइन नंबर्स – 14416 or 1-800-891-4416 भी जारी किये हैं जिन पर आप कॉल कर सकते हैं।

राजन कुमार तिवारी
मनोमय कोश प्रभारी, झारखण्ड राय विश्वविद्यालय, रांची